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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
ततो विक्षिपतः खड्गं सौभद्रस्य यशस्विनः |  ६६   क
शरावरणपक्षान्ते प्रजहार जय़द्रथः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति