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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
भग्नमाज्ञाय़ निस्त्रिंशमवप्लुत्य पदानि षट् |  ६८   क
सोऽदृश्यत निमेषेण स्वरथं पुनरास्थितः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति