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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
तं कार्ष्णिं समरान्मुक्तमास्थितं रथमुत्तमम् |  ६९   क
सहिताः सर्वराजानः परिवव्रुः समन्ततः ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति