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द्रोण पर्व
अध्याय १५३
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सञ्जय़ उवाच
स कर्णं त्वं समुत्सृज्य राक्षसेन्द्रमलाय़ुधम् |  ३   क
जहि क्षिप्रं महावाहो पश्चात्कर्णं वधिष्यसि ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति