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कर्ण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनं द्वादशभिः शरोत्तमै; र्जनार्दनं षोडशभिः समार्दय़त् |  १०   क
स दण्डधारस्तुरगांस्त्रिभिस्त्रिभि; स्ततो ननाद प्रजहास चासकृत् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति