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कर्ण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
स पार्थवाणैस्तपनीय़भूषणैः; समारुचत्काञ्चनवर्मभृद्द्विपः |  १४   क
तथा चकाशे निशि पर्वतो यथा; दवाग्निना प्रज्वलितौषधिद्रुमः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति