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कर्ण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
इतीव भूय़श्च सुहृद्भिरीरिता; निशम्य वाचः सुमनास्ततोऽर्जुनः |  २५   क
यथानुरूपं प्रतिपूज्य तं जनं; जगाम संशप्तकसङ्घहा पुनः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति