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शल्य पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो द्रौणिना विद्धो युद्धे वहुभिराय़सैः |  १   क
तस्य चानुचरैः शूरैस्त्रिगर्तानां महारथैः |  १   ख
द्रौणिं विव्याध समरे त्रिभिरेव शिलीमुखैः ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति