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शल्य पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
स च्छिन्नं मुसलं दृष्ट्वा द्रौणिः परमकोपनः |  ३०   क
आददे परिघं घोरं नगेन्द्रशिखरोपमम् |  ३०   ख
चिक्षेप चैव पार्थाय़ द्रौणिर्युद्धविशारदः ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति