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कर्ण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
संसक्तेषु च योधेषु वर्तमाने च सङ्कुले |  ६७   क
कवन्धान्युत्थितानि स्म शतशोऽथ सहस्रशः ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति