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शल्य पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
सुधर्मा तु ततो राजन्भारद्वाजं महारथम् |  ३४   क
अवाकिरच्छरव्रातैः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति