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शल्य पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
विकर्षन्वै धनुः श्रेष्ठं सर्वभारसहं दृढम् |  ३६   क
ज्वलनाशीविषनिभैः शरैश्चैनमवाकिरत् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति