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शल्य पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा सृक्किणी परिलेलिहन् |  ३८   क
उद्वीक्ष्य सुरथं रोषाद्धनुर्ज्यामवमृज्य च |  ३८   ख
मुमोच तीक्ष्णं नाराचं यमदण्डसमद्युतिम् ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति