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शल्य पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
तत्राश्चर्यमपश्याम दृष्ट्वा तेषां पराक्रमम् |  ४४   क
यदेको युगपद्वीरान्समय़ोधय़दर्जुनः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति