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शल्य पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
तैस्तु क्षिप्ताः शरा राजन्कार्तस्वरविभूषिताः |  ५   क
अर्जुनस्य रथोपस्थं पूरय़ामासुरञ्जसा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति