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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
सोपचारस्तु कृष्णस्तां दुःखितां भृशदुःखितः |  ३४   क
सिक्त्वाम्भसा समाश्वास्य तत्तदुक्त्वा हितं वचः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति