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शान्ति पर्व
अध्याय १३०
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भीष्म उवाच
असाधुभ्यो निरादाय़ साधुभ्यो यः प्रय़च्छति |  ४   क
आत्मानं सङ्क्रमं कृत्वा कृत्स्नधर्मविदेव सः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति