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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
स्रुग्भाण्डपरमा नित्यं त्रेताग्निशरणाः सदा |  १७   क
सन्तः सत्पथनित्या ये ते यान्ति परमां गतिम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति