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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तस्य पूजय़ित्वा च पार्थिवाः |  ६२   क
पुनरेवान्ववर्तन्त पाण्डवानातताय़िनः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति