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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
यस्तु शुद्धः स्वधर्मेण ज्ञानविज्ञानवाञ्शुचिः |  १५   क
धर्मज्ञो धर्मनिरतः स धर्मफलमश्नुते ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति