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द्रोण पर्व
अध्याय १६८
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नोचुस्तत्र महारथाः |  १   क
अप्रिय़ं वा प्रिय़ं वापि महाराज धनञ्जय़म् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति