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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
वानप्रस्थेषु यो धर्मस्तं मे शृणु समाहिता |  ४   क
श्रुत्वा चैकमना देवि धर्मवुद्धिपरा भव ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति