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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् |  ५५   क
गुरुवन्नाभ्यनन्दन्त कुमारान्नान्वपालय़न् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति