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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
संसिद्धैर्निय़तैः सद्भिर्वनवासमुपागतैः |  ५   क
वानप्रस्थैरिदं कर्म कर्तव्यं शृणु यादृशम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति