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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
साधय़ित्वात्मनात्मानं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः |  ५०   क
चीर्त्वा द्वादश वर्षाणि दीक्षामेकां मनोगताम् |  ५०   ख
स्वर्गलोकमवाप्नोति देवैश्च सह मोदते ||  ५०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति