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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
चीर्त्वा द्वादश वर्षाणि दीक्षामेकां मनोगताम् |  ५३   क
अरणीसहितं स्कन्धे वद्ध्वा गच्छत्यनावृतः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति