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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
स शक्रलोकगो नित्यं सर्वकामपुरस्कृतः |  ५५   क
दिव्यपुष्पसमाकीर्णो दिव्यचन्दनभूषितः |  ५५   ख
सुखं वसति धर्मात्मा दिवि देवगणैः सह ||  ५५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति