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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
वीरलोकगतो वीरो वीरय़ोगवहः सदा |  ५६   क
सत्त्वस्थः सर्वमुत्सृज्य दीक्षितो निय़तः शुचिः |  ५६   ख
वीराध्वानं प्रपद्येद्यस्तस्य लोकाः सनातनाः ||  ५६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति