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वन पर्व
अध्याय १११
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लोमश उवाच
न कल्प्यन्ते समिधः किं नु तात; कच्चिद्धुतं चाग्निहोत्रं त्वय़ाद्य |  २१   क
सुनिर्णिक्तं स्रुक्स्रुवं होमधेनुः; कच्चित्सवत्सा च कृता त्वय़ाद्य ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति