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शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
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भीष्म उवाच
एतद्वाक्यं गुरोः श्रुत्वा शिष्यास्ते हृष्टमानसाः |  ३५   क
पुनः प्राञ्जलय़ो भूत्वा प्रणम्य शिरसा गुरुम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति