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वन पर्व
अध्याय १००
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लोमश उवाच
तस्मात्त्वां देव देवेश लोकार्थं ज्ञापय़ामहे |  २४   क
रक्ष लोकांश्च देवांश्च शक्रं च महतो भय़ात् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति