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द्रोण पर्व
अध्याय १३०
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सञ्जय़ उवाच
प्रमथ्नन्तं तदा वीरं भारद्वाजं महारथम् |  १४   क
अभ्यवर्तत सङ्क्रुद्धः शिवी राजन्प्रतापवान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति