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द्रोण पर्व
अध्याय १३०
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सञ्जय़ उवाच
तं शिविः प्रतिविव्याध त्रिंशता निशितैः शरैः |  १६   क
सारथिं चास्य भल्लेन स्मय़मानो न्यपातय़त् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति