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द्रोण पर्व
अध्याय १३०
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सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणो हय़ान्हत्वा सारथिं च महात्मनः |  १७   क
अथास्य सशिरस्त्राणं शिरः काय़ादपाहरत् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति