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द्रोण पर्व
अध्याय १३०
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सञ्जय़ उवाच
तस्य मुष्टिहतस्याजौ पाण्डवेन वलीय़सा |  २१   क
सर्वाण्यस्थीनि सहसा प्रापतन्वै पृथक्पृथक् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति