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द्रोण पर्व
अध्याय १३०
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सञ्जय़ उवाच
कर्णस्तु पाण्डवे शक्तिं काञ्चनीं समवासृजत् |  २६   क
ततस्तामेव जग्राह प्रहसन्पाण्डुनन्दनः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति