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द्रोण पर्व
अध्याय १३०
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सञ्जय़ उवाच
ततः सुतौ ते वलिनौ शूरौ दुष्कर्णदुर्मदौ |  ३४   क
मुष्टिनाहत्य सङ्क्रुद्धो ममर्द चरणेन च ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति