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द्रोण पर्व
अध्याय १३०
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सञ्जय़ उवाच
ततो यमौ द्रुपदविराटकेकय़ा; युधिष्ठिरश्चापि परां मुदं यय़ुः |  ३८   क
वृकोदरं भृशमभिपूजय़ंश्च ते; यथान्धके प्रतिनिहते हरं सुराः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति