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द्रोण पर्व
अध्याय १३०
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽभवत्तिमिरघनैरिवावृतं; महाभय़े भय़दमतीव दारुणम् |  ४०   क
निशामुखे वडवृकगृध्रमोदनं; महात्मनां नृपवरय़ुद्धमद्भुतम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति