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आदि पर्व
अध्याय १३१
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वरत्नसमाकीर्णे पुंसां देशे मनोरमे |  ४   क
इत्येवं धृतराष्ट्रस्य वचनाच्चक्रिरे कथाः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति