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शान्ति पर्व
अध्याय १३१
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भीष्म उवाच
नाय़ं लोकोऽस्ति न पर इति व्यवसितो जनः |  १३   क
नालं गन्तुं च विश्वासं नास्तिके भय़शङ्किनि ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति