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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
स द्विजो वैश्यतामेति वैश्यो वा शूद्रतामिय़ात् |  ११   क
स्वधर्मात्प्रच्युतो विप्रस्ततः शूद्रत्वमाप्नुते ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति