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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
तत्रासौ निरय़ं प्राप्तो वर्णभ्रष्टो वहिष्कृतः |  १२   क
व्रह्मलोकपरिभ्रष्टः शूद्रः समुपजाय़ते ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति