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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
स्वस्थानात्स परिभ्रष्टो वर्णसङ्करतां गतः |  १४   क
व्राह्मणः क्षत्रिय़ो वैश्यः शूद्रत्वं याति तादृशः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति