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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
उग्रान्नं गर्हितं देवि गणान्नं श्राद्धसूतकम् |  १७   क
घुष्टान्नं नैव भोक्तव्यं शूद्रान्नं नैव कर्हिचित् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति