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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
व्राह्मणत्वं शुभं प्राप्य दुर्लभं योऽवमन्यते |  २२   क
अभोज्यान्नानि चाश्नाति स द्विजत्वात्पतेत वै ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति