अनुशासन पर्व  अध्याय १३१

महेश्वर उवाच

अव्रती वृषलीभर्ता कुण्डाशी सोमविक्रय़ी |  २४   क
निहीनसेवी विप्रो हि पतति व्रह्मय़ोनितः ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति