अनुशासन पर्व  अध्याय १३१

महेश्वर उवाच

गुरुतल्पी गुरुद्वेषी गुरुकुत्सारतिश्च यः |  २५   क
व्रह्मद्विट्चापि पतति व्राह्मणो व्रह्मय़ोनितः ||  २५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति