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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
शूद्रकर्माणि सर्वाणि यथान्याय़ं यथाविधि |  २७   क
शुश्रूषां परिचर्यां च ज्येष्ठे वर्णे प्रय़त्नतः |  २७   ख
कुर्यादविमनाः शूद्रः सततं सत्पथे स्थितः ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति