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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
ग्राम्यधर्मान्न सेवेत स्वच्छन्देनार्थकोविदः |  ३८   क
ऋतुकाले तु धर्मात्मा पत्नीं सेवेत नित्यदा ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति