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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
सर्वोपवासी निय़तः स्वाध्याय़परमः शुचिः |  ३९   क
वर्हिष्कान्तरिते नित्यं शय़ानोऽग्निगृहे सदा ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति